अरावली विरासत जन अभियान: राजस्थान की जीवनरेखा को बचाने का जनआंदोलन

अंतरराष्ट्रीय पर्वत दिवस 11 दिसंबर के अवसर पर जयपुर में ग्रामीणों, नागरिक समाज समूहों, पर्यावरणविदों और शोधकर्ताओं ने ‘अरावली विरासत जन अभियान’ की शुरुआत की।यह एक महत्वपूर्ण जन-आधारित संरक्षण अभियान है, जिसका उद्देश्य अरावली पर्वतमाला की प्राकृतिक, पर्यावरणीय और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करना है। अरावली पर्वतमाला न केवल राजस्थान बल्कि पूरे उत्तर-पश्चिम भारत के लिए जीवनरेखा मानी जाती है। यह अभियान जनसहभागिता के माध्यम से जल, जंगल, जमीन और जैव-विविधता के संरक्षण पर केंद्रित है
अरावली पर्वतमाला: ऐतिहासिक और भौगोलिक परिचय
अरावली पर्वतमाला विश्व की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक मानी जाती है अरावली पर्वतमाला राजस्थान की भौगोलिक दृष्टि बहुत महत्वपूर्ण हैं, अरावली पर्वतमाला राजस्थान के कुल क्षेत्रफल का 9% माना जाता है ,जिसमें राजस्थान की कुल जनसंख्या का 10% जनसंख्या अरावली में निवास करती हे, जिसे राजस्थान की जीवन रेखा कहा जाता हे,अरावली पर्वतमाल का विस्तार- पालनपुर (गुजरात) से लेकर रायसीना की पहाड़ी (दिल्ली तक) तक फैला हुआ हे , वही राजस्थान में इसका विस्तार खेड़ब्रड्म (गुजरात सीमा) से खेतड़ी (झुंझुनू ) तक हे , अरावली पर्वतमाला की कुल लंबाई 692 किलोमीटर है वही राजस्थान में अरावली की कुल लंबाई 550 किलोमीटर हे, अरावली की सर्वाधिक लम्बाई राजस्थान है, अरावली मुख्य रूप से राजस्थान के 9 जिलों में फैली (उदयपुर, सिरोही, राजसमंद, अजमेर, सीकर, झुंझुनूं, जयपुर, दौसा, अलवर) हुई हे |
अरावली संकट में क्यों हे |
हाल में 20 नवंबर, 2025 को सर्वोच्च न्यायालय ने अरावली पर्वतमाला की परिभाषा पर फैसला सुनाया। अपने फैसले में, पीठ ने भारत की सबसे पुरानी पर्वतमाला की परिभाषा के संबंध में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) की एक समिति द्वारा की गई सिफारिशों को स्वीकार किया। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार 100 मीटर से कम ऊँचाई वाली पहाड़ियों को “पहाड़” न मानने की व्याख्या सामने आई है, जिसने अरावली के विशाल भूभाग को कानूनी संरक्षण से बाहर करने का खतरा पैदा कर दिया है। यह केवल शब्दों का खेल नहीं है, बल्कि इसके दूरगामी परिणाम राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और पूरे उत्तर-पश्चिम भारत के पर्यावरणीय भविष्य को सीधे प्रभावित करने वाले हैं।
फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया के आँकड़े इस संकट की गंभीरता को और स्पष्ट करते हैं। देश में मैप की गई 12,081 पहाड़ियों में से केवल 1,048 यानी महज 8.7 प्रतिशत ही 100 मीटर की ऊँचाई के मानक पर खरी उतरती हैं। इसका सीधा अर्थ यह है कि अरावली का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा इस नई व्याख्या के बाद कानूनी सुरक्षा खो सकता है। यह स्थिति खनन, रियल एस्टेट और निजी परियोजनाओं के लिए रास्ता खोलती है, जबकि पर्यावरण और स्थानीय समुदायों के लिए यह विनाश का संकेत है।
अरावली केवल पहाड़ियों की श्रृंखला नहीं है। यह 300 से अधिक जीव-जंतुओं और पक्षियों का प्राकृतिक आवास है, लाखों पशुपालकों के लिए चारागाह है और बनास, साबरमती तथा लूणी जैसी नदियों का उद्गम स्थल भी है। इसकी चट्टानी संरचना वर्षा जल को रोककर उसे जमीन के भीतर पहुँचाती है, जिससे पूरे क्षेत्र में भूजल रिचार्ज होता है। पहले से ही जल संकट से जूझ रहे पश्चिमी राजस्थान के लिए अरावली का कमजोर होना सूखे को स्थायी बना देने जैसा होगा।

अरावली का राजस्थान में महत्व
- अरावली थार मरुस्थल के विस्तार को रोकने में प्राकृतिक दीवार का कार्य करती है
- मानसून के दौरान वर्षा जल को रोककर संरक्षण करती है
- अरावली से राजस्थान की सर्वाधिक नदियों का उद्गम क्षेत्र हे |
- वन्यजीवों और वनस्पतियों का प्राकृतिक आवास माना है |
- अरावली बंगाल की खाड़ी से आने वाली मानसूनी हवाओं को रोककर पूर्वी राजस्थान में वर्षा करती है।
- यह राजस्थान का सर्वाधिक अभयारण्य अरावली भू भाग है।
- अरावली सर्वाधिक वनस्पति वाला क्षेत्र है। वन्यजीवों की शरणस्थली है
- राजस्थान में सर्वाधिक खनिज पदार्थों की वाला भाग है।
- अरावली पर्वतमाला को भारत की महान जल विभाजक रेखा कहा जाता है।
- राजस्थान की जीवन रेखा’ कहा। जाता है।
अरावली को खतरे
पिछले कुछ सालों में अरावली क्षेत्र पर अनेक मानवीय दबाव बढ़े
- वनों की कटाई – ईंधन, कृषि विस्तार और निर्माण कार्यों के लिए वनों की कटाई की जा रही है|
- अवैध खनन – पत्थर, मार्बल और अन्य खनिजों का अनियंत्रित दोहन
- जलस्रोतों का सूखना – तालाब, बावड़ी और नालों का नष्ट होना
- अतिक्रमण – पहाड़ी और वन भूमि पर अवैध कब्जे
- जैव विविधता में गिरावट – वन्यजीवों और पौधों की प्रजातियों का संकट
- इन सभी कारणों ने अरावली के पारिस्थितिकी तंत्र को कमजोर कर दिया, जिससे जल संकट, गर्मी में वृद्धि और कृषि पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा।